जो किनारो पर जन्मे...
और किनारे पर हि मर गये!
माना के अलग-अलग थे,
हमें और तुम्हे दिखनेवाले नजारे...
पर सब वही तो थे,
हम इस किनारे तो तुम उस किनारे...
न जाने कितनी पिढीया निकल गयी,
कितने साल बित गये इस किनारे...
न जाने कितने लोग जन्मे, कितने चल बसे,
सभी के एक जैसे हि थे नजारे...
कभी किस दिन किनारे से मन उब गया...
तो चल भी दिये तो कहा...
किसीं दुसरें किनारे!
कभी किसीं ने देश छोड, विदेश जाना चाहा...
तो भी हवाईजहाज से उतरे कहा?
उस देश के किस अलग हि किनारे!
ऐसें ही किनारो किनारो से जिंदगी कटती गयी...
और मरे भी तो कहा?
या तो इस किनारे या उस किनारे!
काश कोई बिन मांझी की नाव मिली होती...
और भटक जाते बिलकुल,
इस परंपरागत किनारो सें...
भला हम गोते खाते रेहते, इस समंदर में...
पर किनारो के नजारों से कितने अलग है,
महासागर के ये विशालकाय नजारे!
जब निकले थे एकेले, बिन मांझी की नाव लिये
सबने रोका था, समंदर में जाने सें...
जो दृश्य में देख पा रहा हू, क्या कभी देख पाता,
डर के किनारे पर हि रुक जाने सें?
असली सफलता उसे नहीं केहते, जो मिलती हैं,
एक किनारे सें दुसरे किनारे जाने सें...
बल्की उस असफल सही, पर कोशिश को केहते हैं,
जो मिले किनारे छोड खुद समंदर मे जाने सें...
~ अरुण भऊड
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