Saturday, August 16, 2025

अंतरिक्ष की यात्रा

 नमस्ते, सभी गुरूजन और विद्यार्थियों | 

मेरा नाम अक्षरा भऊड हैं |  में कक्षा पाँचवी ब में पढ़ती हूँ | 

आजकी मेरी प्रस्तुति का विषय हैं... "अंतरिक्ष की यात्रा"


में खिड़की के पास बैठी थी और सूरज को देख रहीं थी | 

तभी मैंने सोचा , अगर मैं सूरज के पास चली जाऊ तो क्या होगा? 


फिर मैंने अपनी आँखें बंद कीं और कल्पना में तैरने लगी।

धीरे धीरे मेरा कमरा पीछे छूट गया...

और में तैरते पहुँच गयी... अंतरिक्ष में!


अंतरिक्ष में ज़मीन नहीं होती।

वहाँ हवा नहीं होती।

वहाँ गुरुत्वाकर्षण नहीं होता —

इसलिए सब कुछ तैरता है:

मैंने एक बिस्किट निकालने की कोशिश की —

वो गोल-गोल घूमते हुए मेरे सामने तैर गया।

और पानी?

वो बूँद बनकर हवा में तैरता है।


मैंने सूरज को पास से देखा।
वो इतना गरम था कि में और पास चली जातीं तो जल जाती।

फिर मैंने देखा कई सारें ग्रह सूरज के चक्कर काट रहे थे |
 
पहले मैंने बुध को देखा, वो सूरज के सबसे नज़दीक था | 

शुक्र सबसे चमकीला ग्रह है।
लेकिन इतना गरम, कि वहाँ कुछ भी जिंदा नहीं रह सकता।

उसके बगल में सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को देखा ।
नीला, हरा, बादलों से घिरा।
यहाँ हवा है, पानी है, ज़िंदगी है
और माँ के हाथ की रोटी भी।

फिर मैं पहुँची सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति पर।
इतना बड़ा कि उसमें १३०० पृथ्वियाँ समा जायें !

शनि के चारों ओर छल्ले थे।
बर्फ, पत्थर और धूल के।

मंगल लाल दिखता है।
जैसे लाल मिट्टी का गोला पर बहुत ही अकेला।

यूरेनस नीला है और बहुत ठंडा।
नेपच्यून और भी ज़्यादा ठंडा!
जैसे पूरी दुनिया ही फ्रीज़ हो गई हो।

इतने सारे ग्रह देखते देखते रात हो गयी 
और फिर मैंने चाँद को देखा।
वो खुद ही पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।
और फिर याद आया — हमारे बनाए उपग्रह भी हैं |
जैसे मंगलयान... जो ग्रहों की जासूसी करते हैं |

अंत में,
मैं वापस पृथ्वी पर आयी —
अपनी खिड़की के पास।
अब मुझे अपने स्कूल की किताबें थोड़ी और मज़ेदार लग रही थीं।





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